रसोई का जीरा भी कितना उपयोगी है!

रसोई में रोज उपयोग होने वाला जीरा आयुर्वेद में केवल मसाला नहीं है। दीपनीय, पाचनीय, रोचन और संग्राही गुणों वाले इस द्रव्य का आयुर्वेद में क्या महत्व है और इसका उचित उपयोग कैसे समझें?

हमेशा हितकारी धनिया

धनिया केवल रसोई का मसाला नहीं है। आयुर्वेद में इसे दीपन, पाचन, रोचक और ग्राहि गुणों वाला द्रव्य बताया गया है। हरे और सूखे धनिया के गुणों में महत्वपूर्ण अंतर भी समझना आवश्यक है।

इलायची — केवल मुखवास या एक औषधीय द्रव्य?

इलायची केवल सुगंधित मुखवास नहीं है। आयुर्वेद में इसके मुखशोधन, दीपनीय, पाचन और कफशामक गुणों के कारण विशेष स्थान है। जानिए इसके पारंपरिक उपयोग और सावधानियां।

हमेशा सेवन करने योग्य धनिया — आयुर्वेद में धान्यक का महत्व

धनिया केवल भोजन का स्वाद और सुगंध बढ़ाने वाला पदार्थ नहीं है। आयुर्वेद में धान्यक को पाचन, दाह, तृष्णा, रुचि और मूत्रल गुणों से जोड़ा गया है।

च्यवनप्राश: ताज़े आंवले और लगभग 50 जड़ी-बूटियों से बना संपूर्ण स्वास्थ्य टॉनिक

च्यवनप्राश — एक रसायन: “यत् जरा-व्याधि नाशनम्, तद् रसायनम्” — जो वृद्धावस्था और रोग का नाश करे, उसे रसायन (कायाकल्प करने वाली) औषधि कहते हैं। अर्थात, च्यवनप्राश का नियमित सेवन बुढ़ापे को आने से रोकने में मदद करता है। च्यवनप्राश एक एंटी-एजिंग रसायन के रूप में: यह वृद्धावस्था से जुड़ी कमजोरी दूर करके शक्ति और …
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देवदार (Cedrus Deodara): वजन, बुखार और त्वचा रोगों में आयुर्वेदिक उपयोग

देवों का प्रदेश यानी हिमाचल प्रदेश — हिमालय क्षेत्र में उगने वाला यह देवदार, देवताओं जैसा ही भद्र और देवताओं की ऊंचाई जैसी 200-250 फीट की ऊंचाई तक पहुंचने वाला यह वृक्ष सचमुच दिव्य है। “भद्रदारु” नाम इसकी कल्याणकारकता और श्रेष्ठता को दर्शाता है। ऊपर से शंकु आकार का दिखने वाला यह 200-250 फीट ऊंचा …
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रास्ना (Pluchea Lanceolata): वात रोगों और जोड़ों के दर्द के लिए आयुर्वेद की श्रेष्ठ औषधि

“रास्ना वातहराणाम्” — चरक संहिता, सूत्रस्थान 25। वायु (वात) को दूर करने में रास्ना सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। आजकल वायु के रोगों की भरमार है — लगभग हर घर में कोई न कोई व्यक्ति वायु के अस्सी प्रकारों में से किसी एक रोग से पीड़ित मिल ही जाता है। जोड़ों का दर्द इनमें सबसे बड़ी …
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अजमोदादि चूर्ण – जोड़ों के दर्द, सायटिका और कमर दर्द की आयुर्वेदिक औषधि

आमवात, संधिवात, रांझण (सायटिका), कटिशूल (कमर दर्द), आमपाचन तथा शरीर में वायु के कारण होने वाले शूल जैसे रोगों के लिए अजमोदादि चूर्ण एक अत्यंत प्रभावी औषधि माना जाता है। बनाने की विधि: यह चूर्ण बनाने के लिए बाजार से निम्नलिखित औषधियां साबुत लाकर, साफ करके, कूटकर और चूर्ण बनाकर इस अनुपात में मिलाएं: अजमोद …
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अर्जुन चूर्ण – हृदय, वजन और अस्थिभंग की आयुर्वेदिक औषधि

बनाने की विधि: अर्जुन के वृक्ष से या पंसारी की दुकान से अर्जुन (साजड़ या सादड़) की छाल लाकर उसे बारीक कूट लें और कपड़े से छानकर बारीक चूर्ण बना लें, फिर इसे एक साफ, सूखी बोतल में भरकर रख लें। सेवन विधि: एक से दस ग्राम तक दिन में दो-तीन बार दूध के साथ …
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गरमालो (आरग्वध / अमलतास) – कब्ज की आयुर्वेदिक औषधि

20 से 30 फुट ऊंचे गरमालो (अमलतास) के वृक्ष की पहचान इसकी गोल, लकड़ी जैसी फलियों से होती है — पकने पर मरून रंग की और कच्ची अवस्था में हरे रंग की, लगभग एक से डेढ़ फुट लंबी और अंगूठे जितनी मोटी — साथ ही इस पर आने वाले झूमर जैसे ताजे पीले फूल भी …
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