देवदार (Cedrus Deodara): वजन, बुखार और त्वचा रोगों में आयुर्वेदिक उपयोग

देवों का प्रदेश यानी हिमाचल प्रदेश — हिमालय क्षेत्र में उगने वाला यह देवदार, देवताओं जैसा ही भद्र और देवताओं की ऊंचाई जैसी 200-250 फीट की ऊंचाई तक पहुंचने वाला यह वृक्ष सचमुच दिव्य है।

“भद्रदारु” नाम इसकी कल्याणकारकता और श्रेष्ठता को दर्शाता है। ऊपर से शंकु आकार का दिखने वाला यह 200-250 फीट ऊंचा वृक्ष भव्य और सुंदर दिखाई देता है। तीस-चालीस वर्ष का होने के बाद ही इसमें फल आते हैं। सौ-दो सौ वर्षों तक जीवित रहने वाला यह देवदार वृक्ष जितना पुराना होता जाता है, उतना ही मजबूत बनता जाता है। तेल से भरपूर होने के कारण इसकी लकड़ी चिकनी और चमकदार दिखाई देती है, और सुगंधित तेल होने के कारण यह और भी अधिक मनभावन लगता है।

देवदार का उपयोग अलग-अलग तरीकों से किया जाता है। इसका उपयोग प्रायः यज्ञ, होम, हवन में समिधा के रूप में होता है, तो इसकी मजबूत लकड़ी धनी लोगों के फर्नीचर की शोभा बढ़ाती है। इससे निकलने वाले तारपीन के तेल के उपयोग रंगकाम से लेकर अनगिनत हैं। धूप के रूप में जलाने से यह वातावरण को सुगंधित बनाता है। इस प्रकार इसके उपयोगों को देखते हुए यह अत्यंत मूल्यवान देवदार अधिक से अधिक उगाए जाने योग्य है। यह सदियों से हमारे जंगलों में संरक्षित रहा है, परंतु भौतिकता की भागदौड़ में कट रहे जंगलों के कारण इसकी संख्या दिन-प्रतिदिन घटती जा रही है, जो हमारे लिए एक दुखद समाचार है। यदि सरकार भी इसे व्यावसायिक दृष्टि से देखकर इसका रोपण शुरू करे, तो भले आज नहीं, पर सौ-दो सौ वर्षों बाद हमारी चौथी-पांचवीं पीढ़ी, यदि उनमें संस्कार बचे रहे, तो अवश्य आशीर्वाद देगी और याद करेगी। परंतु आज ही के बारे में सोचने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि जिस आम के पेड़ की कैरी आज हम खा रहे हैं, वह आम हमने खुद नहीं लगाया था।

Cedrus Deodara नाम वाला यह पूर्णतः भारतीय वृक्ष अपने औषधीय गुणों के कारण वैद्यों का सदा प्रिय रहा है। वातनाशक होने और स्तन्य-शोधन कर्म (स्तन के दूध के दोषों को दूर करने) के कारण यह विशेषकर प्रसूता (प्रसव के बाद की) महिलाओं के लिए एक वरदान स्वरूप है।

लघु (हल्का) और स्निग्ध गुण वाला तथा स्वाद में कड़वा देवदार — इसकी मुख्यतः छाल का ही उपयोग किया जाता है। यह स्वभाव से उष्ण है और पचने में तीखा है।

इसके विभिन्न कर्मों पर विचार करें तो यह सूजन मिटाने वाला, वेदना-स्थापक (दर्द निवारक), वेदना दूर करने वाला, कुष्ठघ्न (त्वचा रोगों को दूर करने वाला), कफ शामक, व्रणरोपण (घाव भरने वाला), कृमिनाशक, हृदय को उत्तेजित करने वाला तथा सुगंधित होने के कारण कफ को बाहर निकालने वाला और कफ की दुर्गंध को दूर करने वाला है।

देवदार लेखन कर्म करने वाला होने के कारण स्थौल्य (मोटापे) के रोगों में भी एक कारगर औषधि के रूप में उपयोग किया जा सकता है। इसका कुष्ठघ्न गुण विभिन्न प्रकार के त्वचा विकारों को दूर करता है, और स्वेदजनन (पसीना लाने वाला) गुण होने के कारण ज्वर जैसी अवस्थाओं में इसका बाह्य और आंतरिक दोनों प्रकार से उपयोग किया जाता है।

उपयोग:

  1. ऊरुस्तंभ (जांघ की जकड़न) पर — देवदार को घिसकर उसका गरम लेप करें।
  2. कफज गलगंड (कफ प्रकार की गलगंड) पर — देवदार और इंद्रवारुणी की जड़ों को पानी में पीसकर लेप करें।
  3. प्रसूता स्त्री के लिए — देवदार, दालचीनी (तज), कुठ, पिप्पली, सोंठ, कायफल, नागरमोथा, करियातु, कड़वी, धनिया, हरड़े, गजपीपर, भोरिंगनी, गोखरू, धमासा, अतिविष, गिलोय, बेल, शाहजीरा — इन सबका काढ़ा बनाकर प्रसूता स्त्री को पिलाने से शूल (दर्द), सांस की तकलीफ, खांसी, बुखार, कफ, प्यास, दस्त, उल्टी आदि में लाभ होता है।
  4. स्थौल्य (मोटापा) — देवदार लेखन कर्म करता है, इसलिए मोटापा घटाने, वजन कम करने और अतिरिक्त चर्बी दूर करने के लिए देवदार की छाल का काढ़ा पीने तथा देवदार के बारीक चूर्ण का उद्वर्तन (शरीर पर मलना) करने से मोटापा कम होता है। इसके साथ-साथ पथ्यपालन भी उतना ही आवश्यक है।
  5. ज्वर (बुखार) — स्वेदजनन कर्म के कारण यह शरीर का तापमान कम करता है। देवदार को घिसकर पूरे शरीर पर लेप करने तथा इसका काढ़ा पीने से तुरंत पसीना आने लगता है, और पसीने के कारण तीव्र संताप में राहत मिलने लगती है। साथ ही यह आम का पाचन करने वाला होने के कारण बुखार मिटाने में भी लाभदायक है।
देवदार (Cedrus Deodara) क्या है?

देवदार हिमालय क्षेत्र में उगने वाला एक विशाल, सुगंधित वृक्ष है, जिसकी लकड़ी और छाल आयुर्वेद में सदियों से औषधि के रूप में उपयोग की जाती रही है। इसे “भद्रदारु” भी कहा जाता है।

देवदार के मुख्य औषधीय गुण क्या हैं?

देवदार कफशामक, व्रणरोपण (घाव भरने वाला), कृमिनाशक, हृदय को उत्तेजित करने वाला तथा कुष्ठघ्न (त्वचा रोग मिटाने वाला) गुण रखता है।

वजन घटाने के लिए देवदार का उपयोग कैसे किया जाता है?

देवदार “लेखन कर्म” करता है, अर्थात यह शरीर की अतिरिक्त चर्बी घटाने में सहायक होता है। इसकी छाल का काढ़ा पीने और बारीक चूर्ण का उद्वर्तन करने से मोटापा घटाने में लाभ होता है।

देवदार त्वचा रोगों में कैसे उपयोगी है?

इसका कुष्ठघ्न गुण विभिन्न प्रकार के त्वचा विकारों को दूर करने में मदद करता है, और स्वेदजनन गुण के कारण बुखार जैसी अवस्थाओं में भी इसका बाह्य-आंतरिक उपयोग होता है।

देवदार का उपयोग अन्य किन स्थितियों में किया जाता है?

ऊरुस्तंभ (जांघ की जकड़न), कफज गलगंड, तथा प्रसव के बाद की महिलाओं के लिए बनाए जाने वाले काढ़ों में भी देवदार का उपयोग अन्य औषधियों के साथ किया जाता है।

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वैद्य निकुल पटेल (बी.ए.एम.एस.)

आयुर्वेद कंसल्टेंट
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महत्वपूर्ण सूचना: इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है, और यह किसी भी रोग के निदान या चिकित्सा उपचार का विकल्प नहीं है। कृपया कोई भी उपचार शुरू करने से पहले किसी विशेषज्ञ आयुर्वेदिक वैद्य की सलाह अवश्य लें।

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