रास्ना (Pluchea Lanceolata): वात रोगों और जोड़ों के दर्द के लिए आयुर्वेद की श्रेष्ठ औषधि

“रास्ना वातहराणाम्” — चरक संहिता, सूत्रस्थान 25।

वायु (वात) को दूर करने में रास्ना सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। आजकल वायु के रोगों की भरमार है — लगभग हर घर में कोई न कोई व्यक्ति वायु के अस्सी प्रकारों में से किसी एक रोग से पीड़ित मिल ही जाता है। जोड़ों का दर्द इनमें सबसे बड़ी चुनौती है। एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति के लिए जो जितनी बड़ी चुनौती है, आयुर्वेद में रास्ना जैसी दिव्य औषधियों के कारण उतनी ही सहजता से उसकी चिकित्सा संभव है।

यदि आयुर्वेद की प्रतिष्ठा बढ़ाने वाली औषधियों की सूची बनाई जाए तो रास्ना का नाम लिए बिना वह पूरी नहीं हो सकती। आयुर्वेद में वात-पित्त-कफ से होने वाले कुल लगभग 140 रोगों में से 80 प्रकार के रोग केवल वातदोष के कारण ही होते हैं, और रास्ना के लिए कहा गया है कि वह अशीति वातिकामय है — अस्सी प्रकार के वायु रोगों को मिटाने वाली। अर्थात पचास प्रतिशत से अधिक रोगों को ठीक करने में रास्ना एक महत्वपूर्ण औषधि है।

चरक संहिता में इसे वेदना स्थापन (आज की भाषा में पेन किलर) तथा शुक्रशोधन (शुक्र धातु को शुद्ध करने वाली) कहा गया है। एलोपैथिक दवाओं से बिल्कुल विपरीत — जहां एलोपैथिक पेन किलर शुक्राणुओं का नाश करता है, वहीं रास्ना शुक्र को शुद्ध करती है, उसमें रहे दोषों को दूर करती है। साथ ही यह वयःस्थापन का कार्य भी करती है — अर्थात वायु वृद्धावस्था लाने वाला तत्व है, और वायु को दूर करके रास्ना युवावस्था को बनाए रखने में सहायक है।

रास्ना का वानस्पतिक नाम Pluchea Lanceolata है। यह 1 से 4 फीट ऊंची एक झाड़ीदार क्षुप है जिसकी शाखाओं पर रोएं होते हैं। यह गंगा नदी के ऊंचे तटीय क्षेत्रों तथा पंजाब, राजस्थान और गुजरात की खारी सूखी भूमि में उगती है; इसकी जड़ का औषधि के रूप में उपयोग किया जाता है।

गुण-कर्म:

रास्ना भारी, कड़वी, उष्ण (गर्म तासीर) तथा कटु विपाकी है। उष्ण प्रकृति के कारण यह कफ-वात का नाश करती है, और पूर्वोक्त सभी प्रकार के वातदोषों को भी दूर करती है। यह वेदना स्थापन करने वाली है — अर्थात यह पेन किलर होते हुए भी इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं है।

यह सूजन मिटाने वाली, शीतहर (अत्यधिक ठंडक कम करने वाली), आम का पाचन करने वाली, रेचक, रक्तशोधक, कासहर (खांसी मिटाने वाली), श्वास-दमा मिटाने वाली है। यह ज्वर (विशेषकर वातिक ज्वर) को मिटाने वाली और विषघ्न (विष नाशक) जैसे गुण भी रखती है।

औषधीय उपयोग:

  1. वायु रोगों की श्रेष्ठ औषधि होने के कारण रास्ना अधिकांश वातनाशक औषधियों में मुख्य घटक के रूप में शामिल होती है — जैसे रास्ना सप्तक क्वाथ, महारास्नादि क्वाथ, रास्नादि गुग्गुल, योगराज गुग्गुल, महानारायण तेल, प्रसारिणी तेल, बलाढ्य तेल, बृहद् सैंधवादि तेल, महामाष तेल, महाविषगर्भ तेल आदि में रास्ना का भरपूर उपयोग किया जाता है।
  2. चक्रदत्त ने रांझन (साइटिका) में रास्ना और गुग्गुल को घी के साथ गोली बनाकर लेने की सलाह दी है।
  3. वायु के अस्सी प्रकार के रोगों में रास्ना का उपयोग विभिन्न रूपों में किया जाता है, जिसमें काढ़े का उपयोग सबसे प्रमुख है। वायु के विभिन्न रोगों के शोधन-शमन उपचार में रास्ना का उपयोग चूर्ण, तेल, क्षीरपाक, क्वाथ और घृत सभी रूपों में होता है।
  4. पंचकर्म की विभिन्न क्रियाओं — प्रलेपन, उद्वर्तन, अवसेचन, परिषेक, लेखन, स्वेदन, आस्थापन तथा निरूह बस्ति, उत्तर बस्ति और नस्य — में भी इसका खुलकर उपयोग किया जाता है।
  5. ठंडक दूर करने के लिए — जब शरीर ठंडा पड़ जाए तो रास्ना के बारीक चूर्ण को उबले पानी में पेस्ट बनाकर शरीर पर लेप करें और एक घंटे बाद हटा दें; हर तीन-चार घंटे में इस तरह लेप करते रहने से शरीर में गर्माहट आती है। रास्ना और काली सूखी दाख को साथ पीसकर लेप करने से भी ठंडक दूर होकर गर्माहट आती है।
  6. सूजन के लिए — जोड़ों की तकलीफ में सूजन होने पर रास्ना के चूर्ण को गुग्गुल के साथ गरम करके हल्का गुनगुना लेप करते रहने से सूजन धीरे-धीरे कम होती है।
  7. दर्द के लिए — उपरोक्त लेप के अतिरिक्त, रास्ना से सिद्ध किया गया तेल या रास्नायुक्त तेल जैसे बृहद् सैंधवादि तेल, महानारायण तेल, बलाढ्य तेल, महामाष तेल आदि से मालिश करने तथा कटिबस्ति, जानुबस्ति, ग्रीवाबस्ति जैसे प्रयोग करने से दर्द में बहुत जल्दी लाभ होता है।
  8. वात-जन्य जोड़ों के रोग के लिए — रास्ना की जड़ 20 ग्राम को आठ गुना पानी में चौथाई भाग शेष रहने तक उबालकर, उसमें एक भाग अरंडी का तेल मिलाकर नियमित सेवन करने तथा साथ में अन्य वातनाशक औषधियों और पथ्यपालन से जोड़ों का वातरोग ठीक होता है।
  9. आमवात (रुमेटॉइड आर्थराइटिस) — रास्ना आमवात के लिए एक अचूक अस्त्र है क्योंकि यह आम का पाचन करने वाली और उष्ण है, इसलिए रास्ना के क्वाथ, गुग्गुल, तेल, पंचकर्म क्रियाओं अथवा लेपन के रूप में किसी भी प्रकार का उपयोग आमवात के रोगियों को निश्चित लाभ पहुंचाता है।
  10. श्वास-कास (अस्थमा और पुरानी खांसी) — वायु के कारण होने वाली खांसी और लंबे समय से चली आ रही सांस की तकलीफ में रास्ना की जड़ का काली दाख के साथ काढ़ा बनाकर नियमित सेवन करने और पथ्यपालन रखने से निश्चित लाभ होता है।
  11. ज्वर (बुखार) — रास्ना आम का पाचन करने वाली होने के कारण ज्वर में भी पाचन में सहायक है और इसीलिए ज्वरघ्न (बुखार मिटाने वाली) भी है, यही कारण है कि यह मुख्यतः आमवात में उपयोग की जाती है।
  12. विषघ्न-बल्य-वृष्य कार्य — अपने उष्ण गुण और वातनाशक प्रभाव के कारण रास्ना नाड़ीतंत्र को पुष्टि देकर न्यूरोलॉजिकल विकारों में एक उत्तम नर्वाइन टॉनिक के रूप में कार्य करती है, तथा नाड़ीतंत्र को उत्तेजित करके विषाक्त अवस्थाओं में श्रेष्ठ सुरक्षा प्रदान करती है। वातदोष के कारण होने वाले शीघ्रपतन तथा नपुंसकता को दूर करके यह वाजीकरण कर्म भी करती है।

इतने अनगिनत गुणों के बावजूद रास्ना सहज रूप से सुलभ नहीं है, और वर्षों से इसकी शुद्धता को लेकर कई तरह की आशंकाएं रही हैं। इसलिए किसी भी सामान्य पंसारी की दुकान से न लेकर, किसी विश्वसनीय फार्मेसी की तैयार औषधियां या वैद्य द्वारा तैयार की गई औषधियां ही खरीदकर उपयोग करना हितकर है।

रास्ना क्या है?

रास्ना (Pluchea Lanceolata) आयुर्वेद में वात रोगों को मिटाने के लिए उपयोग की जाने वाली एक श्रेष्ठ औषधि है। चरक संहिता में इसे “वातहराणाम्” यानी वात मिटाने वाली औषधियों में सर्वश्रेष्ठ बताया गया है।

रास्ना के मुख्य फायदे क्या हैं?

रास्ना वायु के 80 प्रकार के रोगों में उपयोगी मानी जाती है, विशेषकर जोड़ों के दर्द, आमवात (रुमेटॉइड आर्थराइटिस), साइटिका और न्यूरोलॉजिकल तकलीफों में यह प्रभावी है।

रास्ना का उपयोग कैसे किया जाता है?

रास्ना का उपयोग चूर्ण, तेल, क्षीरपाक, क्वाथ और घृत जैसे विभिन्न रूपों में किया जाता है, तथा पंचकर्म की विभिन्न क्रियाओं (प्रलेपन, उद्वर्तन, बस्ति, नस्य आदि) में भी इसका खुलकर उपयोग होता है।

जोड़ों की सूजन और दर्द में रास्ना कैसे राहत देती है?

रास्ना के चूर्ण को गुग्गुल के साथ गरम करके गुनगुना लेप करने से जोड़ों की सूजन धीरे-धीरे कम होती है, और रास्ना से सिद्ध तेल (जैसे महानारायण तेल) दर्द में राहत देता है।

शरीर की ठंडक दूर करने के लिए रास्ना का उपयोग कैसे करें?

शरीर ठंडा पड़ जाने पर रास्ना के बारीक चूर्ण को उबले पानी में मिलाकर पेस्ट बनाकर लेप करें, या रास्ना को काली सूखी दाख के साथ पीसकर लेप करें — इससे शरीर में गर्माहट लौट आती है।

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वैद्य निकुल पटेल (बी.ए.एम.एस.)

आयुर्वेद कंसल्टेंट
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महत्वपूर्ण सूचना: इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है, और यह किसी भी रोग के निदान या चिकित्सा उपचार का विकल्प नहीं है। कृपया कोई भी उपचार शुरू करने से पहले किसी विशेषज्ञ आयुर्वेदिक वैद्य की सलाह अवश्य लें।

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