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English: Shirish (Albezia lebbeck) – Ayurvedic Vishaghna (Anti-Poison) Herb
ગુજરાતી: શિરીષ (Albezia lebbeck)
“शिरीषो विषघ्नानाम्” — आचार्य चरक ने भी शिरीष को विषघ्न (विष नाशक) द्रव्य के रूप में वर्णित किया है। दस प्रमुख विषघ्न द्रव्यों में शिरीष को श्रेष्ठ माना गया है। प्राचीन काल से ही विष उतारने के लिए शिरीष का उपयोग होता आया है, और आज भी यह गांवों तथा वनवासी क्षेत्रों में बहुत प्रचलित है। हमारे देश में शिरीष (सरसड़ो) हर जगह पाया जाने वाला वृक्ष है, और सरकार द्वारा वनीकरण परियोजनाओं में भी इसे बार-बार लगाया जाता है। पूरे वर्ष हरा-भरा रहने और घने पत्तों के कारण सुंदर छाया देने के कारण शिरीष को कई जगह लगाया जाता है।
काला और सफेद — इन दो प्रकार के शिरीष में से काला शिरीष विषघ्न के रूप में उपयोग होता है। 10 से 20 फुट ऊंचाई वाला यह मध्यम आकार का वृक्ष पीले फूल आने पर खिल उठता है। शिरीष की आधे से एक फुट लंबी मरून रंग की फलियों में 8 से 10 बीज होते हैं, और इन्हीं बीजों में सबसे अधिक विषघ्न गुण पाया जाता है।
शिरीष का वानस्पतिक नाम Albezia lebbeck है। इसके बीज, छाल और फूल का औषधि के रूप में उपयोग होता है।
गुणकर्म: शिरीष लघु, रूखा और तीक्ष्ण गुण वाला है। स्वाद में यह कसैला, कड़वा और कुछ अंश में मीठा भी है, तथा स्वभाव से कुछ हद तक उष्ण है।
चूंकि इसका उपयोग प्रायः वहीं किया जाता है जहां यह सहज उपलब्ध हो, इसलिए शिरीष अधिकतर ताजा ही उपयोग किया जाता है। साथ ही, शहरों में विष चढ़ने या जहरीले जीव-जंतु के काटने की घटनाएं कम होने के कारण इसके तैयार योग वहां सहज उपलब्ध नहीं होते।
“रसे शिरीषपुष्पस्य सप्ताहं मरिचं सितम् / भावितं सर्पदृष्टानां नस्थपानांगने हितम्” — सफेद मिर्च के चूर्ण को शिरीष के फूलों के रस की सात बार भावना देकर तैयार किए गए चूर्ण का नस्य, पान और अंजन के रूप में उपयोग करने से सांप का विष उतरता है। इस प्रकार शिरीष का सबसे अधिक ऐतिहासिक उपयोग शायद सर्पदंश में ही रहा है।
विभिन्न पारंपरिक प्रयोग (सर्पविष के लिए):
- स्वरस (ताजा रस) – शिरीष के ताजे, हरे पत्तों का रस निकालकर बार-बार एक-एक कप पिलाया जाता था। वमन कराना हो तो एक साथ अधिक मात्रा में रस पिलाया जाता था, और जरूरत होने पर उसमें मिंढण चूर्ण या रीठे का पानी मिलाकर वमन जल्दी कराया जाता था।
- चूर्ण – शिरीष की अंतरछाल का चूर्ण 1 चम्मच, या बीज का चूर्ण 1 से 2 ग्राम की मात्रा में दिया जाता था। सर्पविष में घी को सर्वश्रेष्ठ अनुपान माना गया है, इसलिए लगभग 10 ग्राम चूर्ण को लगभग 100 ग्राम घी के साथ देना लाभदायक माना जाता था।
- काढ़ा – शिरीष की अंतरछाल का काढ़ा लगभग 6 ग्राम की मात्रा में (साथ में बीज चूर्ण 1 से 2 ग्राम) इस उद्देश्य के लिए विशेष उपयोगी माना गया है। कोचला (नक्स वोमिका) विष में भी शिरीष की छाल के उपयोग का ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। चूहे के विष में भी शिरीष की छाल का चूर्ण 1 से 2 ग्राम की मात्रा में घी के साथ बार-बार देने का शास्त्र-आधार है।
संक्षेप में, विषघ्न औषधि के रूप में उपयोग होने वाला शिरीष शरीर में मौजूद विभिन्न प्रकार के विष-आम तथा रक्तदोष को दूर करता माना जाता था, इसीलिए इसे कई औषध-योगों में शामिल किया गया है।
आजकल एलोपैथिक औषधियों के विभिन्न प्रकार के साइड इफेक्ट्स भी एक तरह की विषाक्त अवस्था ही हैं। संभव है कि शिरीष इस दिशा में भी अपनी विषघ्न क्षमता दिखा सके, हालांकि इस दिशा में शोध की निश्चित रूप से गुंजाइश है — भगवान धन्वंतरि के आशीर्वाद से इस दिशा में एक शुरुआत अवश्य की जा सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
शिरीष (Albezia lebbeck) का मुख्य औषधीय कार्य क्या है?
आचार्य चरक ने शिरीष को दस श्रेष्ठ विषघ्न (विष नाशक) द्रव्यों में गिना है — इसके बीज, छाल और फूल का पारंपरिक रूप से विष उतारने के लिए उपयोग होता रहा है।
सांप के काटने पर शिरीष का पारंपरिक उपयोग कैसे किया जाता था?
शिरीष के ताजे हरे पत्तों का रस निकालकर पिलाया जाता था, या सफेद मिर्च के चूर्ण को शिरीष के फूलों के रस की भावना देकर तैयार चूर्ण का नस्य, पान और अंजन के रूप में उपयोग किया जाता था।
क्या सांप काटने या विष चढ़ने पर इस घरेलू उपाय पर निर्भर रहा जा सकता है?
नहीं। सर्पदंश या किसी भी प्रकार का विष जानलेवा आपातकाल है — शिरीष जैसा पारंपरिक उपाय यहां केवल ऐतिहासिक जानकारी के लिए दिया गया है। काटने के बाद बिना समय गंवाए तुरंत नजदीकी अस्पताल जाकर एंटी-वेनम उपचार लेना ही सबसे सुरक्षित और प्रभावी कदम है।
वैद्य निकुल पटेल (बी.ए.एम.एस.)
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