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English: Jatamansi (Nordostachys Jatamansi) – Ayurvedic Herb for the Nervous System
ગુજરાતી: જટામાંસી (Nordostachys Jatmansi)
नदी किनारे उगने वाली, जटा जैसी दिखने वाली घास जैसी जटामांसी को “जटाशंकर” भी कहा जाता है। हिंदी में इसे “बालछड़” और संस्कृत में “जटामांसी” या “मासी” नाम से जाना जाता है। आचार्य चरक ने इसे संज्ञास्थापन (चेतना लाने वाली) औषधियों के वर्ग में शामिल किया है, जिससे इसके महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है। भूमि पर फैलने वाले इस बारहमासी पौधे में एक विशेष प्रकार का सुगंधित तेल होता है, जिसके कारण इसमें औषधीय गुण होते हैं। जटामांसी मुख्यतः रेतीले क्षेत्रों में होने के कारण इसमें प्रायः रेत काफी चिपकी रहती है, इसलिए उपयोग से पहले इसे दो-तीन बार अच्छी तरह धोकर सुखा लेना चाहिए। इसका वानस्पतिक नाम Nordostachys Jatamansi है।
गुणकर्म: जटामांसी एक सुगंधित वनस्पति है, और यह सुगंध इसमें मौजूद उड़नशील तेल के कारण होती है, जो सामान्यतः इसका लगभग नौवां भाग होता है।
संज्ञास्थापन गुण के कारण जटामांसी एक दुर्लभ वनस्पति है जो मुख्यतः मानसिक रोगों और मस्तिष्क संबंधी रोगों में बहुत प्रभावी परिणाम देती है।
यह लघु, स्निग्ध और शीत गुण वाली है; स्वाद में कड़वी, कसैली और कुछ अंश में मीठी भी है, तथा पचने में तीखी है।
जहां तीनों दोष एक साथ प्रबल हों और विशेषकर जहां नाड़ीतंत्र इससे प्रभावित हुआ हो, वहां जटामांसी का आंतरिक और बाह्य दोनों प्रकार से उपयोग लाभदायक है। नाड़ीतंत्र पुष्ट होने पर इसकी कार्यक्षमता बढ़ती है। जटामांसी से सिद्ध तेल की मालिश और मांस्यादि क्वाथ जैसी औषधियों का आंतरिक सेवन त्रिदोष संबंधी रोगों के साथ-साथ उनसे उत्पन्न मानसिक रोगों को भी शांत करता है।
सन्निपातिक ज्वर – त्रिदोष से उत्पन्न भयंकर सन्निपातिक ज्वर में जटामांसी और गुग्गुल का पानी के साथ लेप करने से तापमान में कमी आती है। जटामांसी से सिद्ध तेल की सिर पर मालिश या शिरोधारा करने से मस्तिष्क शांत रहता है और शरीर की जलन में तुरंत राहत मिलती है।
बालों का सफेद होना – बालों की देखभाल के लगभग सभी योगों में जटामांसी एक आवश्यक घटक है और इसके उपयोग से बाल सफेद होने से रुकते हैं। समय से पहले बाल सफेद होने की स्थिति में जटामांसी से सिद्ध तेल की नियमित सिर पर मालिश करने, नस्य के रूप में उपयोग करने और शिरोधारा के रूप में प्रयोग करने से बालों को सफेद होने से रोका जा सकता है और कुछ हद तक उन्हें काला भी किया जा सकता है। जटामांसी का उपयोग सभी हेयर-ऑयल योगों में किया जा सकता है।
हिस्टीरिया, मिर्गी और भूत-बाधा जैसी स्थितियां – हिस्टीरिया, मिर्गी और भूत-बाधा जैसी स्थितियों में जहां रोगी निष्चेष्ट हो जाता है, वहां जटामांसी के साथ सुगंधीवाला, गुग्गुल, चंदन और अगरु की धूनी देने से चेष्टा (प्रतिक्रिया) वापस आती है।
जटामांसी के चूर्ण की आधा ग्राम मात्रा दिन में दो बार दूध के साथ नियमित लेने से पेट में गर्माहट आती है। यह वायु को ऊपर की ओर धकेलता है, जिससे डकार आने और पसीना आने के साथ नाड़ीतंत्र में संवेदना लौट आती है।
चिंता, अवसाद और तनाव – मन की बेचैनी की स्थिति में जटामांसी के चूर्ण की अल्प मात्रा दूध के साथ लंबे समय तक देने से मन शांत होता है।
कमजोरी – मांसपेशियों की कमजोरी और सामान्य दुर्बलता में जटामांसी को दूध के साथ लेने से यह नाड़ीतंत्र को पुष्ट कर थकान कम करती है।
मूत्राशय की सूजन – पेशाब में रुकावट या दर्द तथा मूत्राशय की सूजन में जटामांसी का काढ़ा गोखरू चूर्ण के साथ देने से सूजन कम होती है और पेशाब खुलकर आने लगता है।
लीवर की सूजन और पीलिया – जटामांसी में पित्तसारक गुण होने के कारण, पीलिया और लीवर की सूजन में इसके काढ़े की थोड़ी मात्रा भूख बढ़ाती है और पित्त को मल के रास्ते बाहर निकालती है। चूंकि जटामांसी वमनकारी भी है, इसलिए इसका उपयोग उचित सावधानी के साथ करना चाहिए।
सिरदर्द – ज्ञानतंतु संबंधी विकारों के कारण होने वाले सिरदर्द में जटामांसी का आंतरिक सेवन और शिरोभ्यंग (सिर पर मालिश) के रूप में बाह्य उपयोग दोनों अत्यंत लाभदायक हैं; ऐसी स्थितियों में जटामांसी हींग या कस्तूरी जैसी अन्य औषधियों की तुलना में तेज़ और अधिक प्रभावी परिणाम देती है।
मासिक धर्म संबंधी विकार – अत्यधिक मासिक पीड़ा और अनियमित मासिक स्राव में जटामांसी लाभदायक है, और विशेष रूप से मासिक धर्म से पहले के दिनों में होने वाली शारीरिक-मानसिक परेशानियों में यह उत्कृष्ट परिणाम देती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
जटामांसी मुख्यतः किसके लिए उपयोग होती है?
संज्ञास्थापन गुण के कारण जटामांसी को मानसिक रोगों और मस्तिष्क संबंधी रोगों में अत्यंत प्रभावी माना जाता है; यह नाड़ीतंत्र को पुष्ट कर उसकी कार्यक्षमता बढ़ाती है।
सिरदर्द में जटामांसी कैसे उपयोगी है?
ज्ञानतंतु संबंधी विकारों के कारण होने वाले सिरदर्द में जटामांसी का आंतरिक सेवन और शिरोभ्यंग के रूप में बाह्य उपयोग दोनों बहुत लाभदायक माने जाते हैं।
बाल सफेद होने से रोकने के लिए जटामांसी का उपयोग कैसे करें?
जटामांसी से सिद्ध तेल की नियमित सिर पर मालिश करने से बालों का समय से पहले सफेद होना रुकता है और कुछ हद तक पहले से सफेद बालों को भी काला किया जा सकता है।
जटामांसी लेते समय क्या ध्यान रखना चाहिए?
जटामांसी अधिक मात्रा में लेने से वमन हो सकता है, इसलिए इसकी मात्रा कम रखनी चाहिए और योग्य वैद्य की सलाह अनुसार ही लेनी चाहिए; मानसिक रोगों में इसका उपयोग उचित निदान और देखरेख में ही करना चाहिए।
वैद्य निकुल पटेल (बी.ए.एम.एस.)
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