आयुर्वेद में रक्तातिसार का अर्थ

‘रक्त’ अर्थात रक्त और ‘अतिसार’ अर्थात बार-बार द्रव मल का प्रवाह।

इस प्रकार रक्तातिसार में मलप्रवृत्ति के साथ रक्तस्राव दिखाई देता है। इसके साथ तृष्णा, शूल, दाह तथा गुदप्रदेश में पीड़ा या पाक जैसे लक्षण भी हो सकते हैं।

चरक संहिता, चिकित्सास्थान, अतिसार चिकित्सा में कहा गया है—

पित्तातिसारी यस्त्वेतां क्रियां मुक्त्वा निषेवते ।
पित्तलान्यन्नपानानि तस्य पित्तं महाबलम् ॥६९॥

कुर्याद्रक्तातिसारं तु रक्तमाशु प्रदूषयेत् ।
तृष्णां शूलं विदाहं च गुदपाकं च दारुणम् ॥७०॥

सरल भाषा में समझें तो:
यदि पित्तप्रधान अतिसार से पीड़ित व्यक्ति पित्त को शांत करने वाली चिकित्सा और उचित आहार-विहार की उपेक्षा करके लगातार पित्त बढ़ाने वाले भोजन-पेय का सेवन करता है, तो पित्त अत्यधिक बढ़कर रक्त को दूषित कर सकता है। इसके परिणामस्वरूप रक्तातिसार के साथ अधिक प्यास, पेट में शूल, जलन तथा गुदप्रदेश में गंभीर पीड़ा या पाक हो सकता है।

आयुर्वेद में रक्तातिसार का अर्थ


रक्तातिसार की संप्राप्ति कैसे समझें?

रक्तातिसार को समझने के लिए केवल ‘खूनी दस्त’ कहना पर्याप्त नहीं है। आयुर्वेद इसकी पृष्ठभूमि में दोष, अग्नि, रक्त और आहार-विहार के संबंध को देखता है।

सामान्य रूप से इसकी संप्राप्ति को इस प्रकार समझ सकते हैं—

पित्तप्रकोप → अतिसार → पित्तवर्धक आहार-विहार का निरंतर सेवन → पित्त की तीव्रता → रक्तदूष्टि → मल के साथ रक्तस्राव → रक्तातिसार

यहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि प्रत्येक रोगी में यही क्रम बिल्कुल उसी प्रकार हो, ऐसा आवश्यक नहीं। चरक के भाष्य में भी रक्तातिसार को पित्त की अत्यधिक विकृति और रक्तदूष्टि से उत्पन्न होने वाली अवस्था के रूप में समझाया गया है।


रक्तातिसार के प्रमुख लक्षण

रक्तातिसार में निम्न लक्षण दिखाई दे सकते हैं—

  • बार-बार पतला या द्रव मल
  • मल के साथ रक्त
  • पेट में मरोड़ या शूल
  • शरीर में जलन
  • अधिक प्यास
  • गुदप्रदेश में जलन
  • गुदप्रदेश में पीड़ा या पाक
  • कुछ परिस्थितियों में ज्वर
  • कमजोरी तथा निर्जलीकरण की प्रवृत्ति

लक्षणों की तीव्रता रोगी की अवस्था, दोषप्रकोप, अग्निबल और रक्तस्राव की मात्रा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।


क्या हर रक्तयुक्त दस्त को रक्तातिसार ही मानना चाहिए?

यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।

आयुर्वेद में रक्तातिसार का अपना विशिष्ट रोग-संदर्भ है। आधुनिक चिकित्सा की दृष्टि से मल में रक्त आने के अनेक कारण हो सकते हैं—आंतों का संक्रमण, पेचिश, आंतों की सूजन, inflammatory bowel disease, बवासीर या अन्य gastrointestinal bleeding।

इसलिए मल में रक्त दिखाई देने पर केवल अपने स्तर पर उसे रक्तातिसार मानकर औषधि लेना उचित नहीं है।

विशेष रूप से यदि रक्त अधिक मात्रा में आ रहा हो, तेज बुखार हो, पेट में तीव्र दर्द हो, चक्कर या अत्यधिक कमजोरी हो अथवा निर्जलीकरण के लक्षण दिखाई दें, तो शीघ्र चिकित्सकीय मूल्यांकन आवश्यक है।


रक्तातिसार में आयुर्वेदिक चिकित्सा का मूल सिद्धांत

आयुर्वेद में चिकित्सा केवल मल को रोक देने तक सीमित नहीं है।

सबसे पहले यह देखना आवश्यक है—

  • रोग किस दोष से संबंधित है?
  • अग्नि कैसी है?
  • आम है या नहीं?
  • पित्त कितना प्रबल है?
  • रक्तदूष्टि कितनी है?
  • मल का स्वरूप कैसा है?
  • रोगी का बल कैसा है?
  • रक्तस्राव की मात्रा कितनी है?
  • रोग नवीन है या पुराना?

यदि आमावस्था उपस्थित हो तो केवल तुरंत संग्राही औषधि देकर मल को रोकना उचित नहीं माना जाता। रोग की अवस्था के अनुसार पहले आम और दोष की स्थिति को समझना आवश्यक है।

इसके बाद पित्तशमन, रक्तस्राव की स्थिति, अग्निसंरक्षण और अतिसार की अवस्था के अनुसार चिकित्सा का क्रम निर्धारित किया जाता है।


रक्तातिसार में उपयोग होने वाले कुछ शास्त्रीय योग

रक्तातिसार में औषधि का चुनाव रोगी की अवस्था देखकर होना चाहिए। नीचे दिए गए योग केवल शास्त्रीय संदर्भ के लिए हैं; इनकी मात्रा, अनुपान और उपयोग की अवधि वैद्यकीय परीक्षण के अनुसार निर्धारित की जानी चाहिए।


कुटजादि रसक्रिया

चरक संहिता में कुटज त्वक, मोचरस, समंगा, फलिनी तथा वत्सकबीज से तैयार कुटजादि रसक्रिया का वर्णन मिलता है। इसे रक्तातिसार तथा रक्तस्राव से संबंधित अवस्थाओं में उपयोगी बताया गया है।

इस योग का उल्लेख चरक संहिता, चिकित्सास्थान, अर्श चिकित्सा के प्रसंग में मिलता है।

अनुपान: रोगी की अग्नि और शक्ति के अनुसार छागदुग्ध, पेया या मण्ड जैसे अनुपान का उल्लेख मिलता है।


कुटजाष्टक

शार्ङ्गधर संहिता में कुटजाष्टक क्वाथ का वर्णन अतिसार की ऐसी अवस्थाओं में किया गया है जिनमें दाह, रक्त, शूल और आम जैसे लक्षण जुड़े हों।

इसमें कुटज के साथ अन्य संग्राही एवं पाचन द्रव्यों का संयोजन किया जाता है।


कुटजावलेह

कुटज-प्रधान अवलेह कल्प भी अतिसार तथा ग्रहणी से संबंधित अवस्थाओं में शास्त्रीय परंपरा में वर्णित है। इसका उपयोग रोग की अवस्था, अग्नि और दोष के अनुसार किया जाना चाहिए।


नागरादि क्वाथ

शार्ङ्गधर संहिता में नागरादि क्वाथ का उल्लेख विशेष रूप से ज्वर के साथ आने वाले अतिसार में मिलता है। इसलिए इसे हर रक्तातिसार में सीधे लागू करना उचित नहीं; रोगी के लक्षणों के अनुसार चिकित्सक इसका चयन करते हैं।


कुटज-प्रधान एकल औषध प्रयोग

भावप्रकाश निघण्टु में कुटज को अतिसार, रक्तातिसार, प्रवाहिका आदि में उपयोगी बताया गया है। कुटज का प्रयोग क्वाथ, फाण्ट या चूर्ण आदि रूपों में शास्त्रीय परंपरा में मिलता है।

इन सभी प्रयोगों में रोग की अवस्था, अग्नि, दोष, आयु, बल तथा वर्तमान रक्तस्राव को ध्यान में रखना आवश्यक है।


अनुपान का महत्व

आयुर्वेद में केवल औषधि का नाम जानना पर्याप्त नहीं है। अनुपान अर्थात औषधि के साथ दिया जाने वाला उपयुक्त द्रव्य भी चिकित्सा का महत्वपूर्ण भाग है।

रक्तातिसार की स्थिति में शास्त्रीय ग्रंथों में रोग की अवस्था के अनुसार—

  • छागदुग्ध
  • पेया
  • मण्ड
  • उपयुक्त शीतल एवं पित्तशामक द्रव्य

आदि का उल्लेख मिलता है।

लेकिन अनुपान का चुनाव भी सभी रोगियों के लिए एक जैसा नहीं किया जा सकता। अग्निबल, आमावस्था, पित्त की तीव्रता तथा रोगी की सहनशक्ति को ध्यान में रखना आवश्यक है।


पंचकर्म की भूमिका

रक्तातिसार की तीव्र रक्तस्रावी अवस्था में पंचकर्म को सामान्य घरेलू उपाय की तरह नहीं किया जाना चाहिए।

विशेषकर तीव्र दस्त, अधिक रक्तस्राव, निर्जलीकरण या दुर्बलता में शोधन की आवश्यकता और उपयुक्तता का निर्णय अनुभवी चिकित्सक द्वारा किया जाना चाहिए।

रोग की तीव्र अवस्था शांत होने के बाद, यदि कोई विशिष्ट दोषदुष्टि या पुनरावृत्ति की प्रवृत्ति हो, तो रोगी की स्थिति के अनुसार चिकित्सा योजना बनाई जा सकती है।


रक्तातिसार में आहार

आहार का उद्देश्य इस अवस्था में अग्नि पर अनावश्यक भार डाले बिना शरीर को पोषण देना और पाचन को धीरे-धीरे सामान्य करना है।

उपयुक्त आहार रोग की अवस्था के अनुसार हो सकता है—

  • हल्की पेया
  • मण्ड
  • अच्छी तरह पका हुआ शालि चावल
  • चिकित्सकीय सलाह के अनुसार छागदुग्ध
  • पर्याप्त एवं सहनीय मात्रा में द्रव
  • सरल, ताजा और सुपाच्य भोजन

भोजन की मात्रा बहुत अधिक न हो। बार-बार दस्त होने पर शरीर में जल एवं इलेक्ट्रोलाइट की कमी हो सकती है, इसलिए आधुनिक चिकित्सकीय दृष्टि से आवश्यक पुनर्जलीकरण की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।


किन चीजों से बचें?

पित्त और अतिसार को बढ़ाने वाली परिस्थितियों से बचना उपयोगी है।

विशेष रूप से—

  • बहुत तीखा भोजन
  • अत्यधिक मसाले
  • अधिक तला हुआ भोजन
  • बहुत खट्टे पदार्थ
  • शराब
  • अत्यधिक चाय-कॉफी
  • बासी भोजन
  • अस्वच्छ भोजन और पानी
  • आवश्यकता से अधिक भोजन
  • पाचन शक्ति कमजोर होने पर भारी भोजन

से बचना चाहिए।


योग, प्राणायाम और दिनचर्या

रक्तयुक्त सक्रिय अतिसार की अवस्था में कठिन योगाभ्यास या जोरदार प्राणायाम उचित नहीं है।

रोगी को पर्याप्त विश्राम देना, शरीर में पानी की कमी न होने देना और भोजन-पेय को चिकित्सकीय सलाह के अनुसार व्यवस्थित रखना अधिक महत्वपूर्ण है।

स्वास्थ्य सामान्य होने के बाद हल्के श्वसन अभ्यास, सहज योगासन और नियमित दिनचर्या धीरे-धीरे अपनाई जा सकती है।


कब तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें?

निम्न स्थितियों में देरी नहीं करनी चाहिए—

  • मल में बार-बार रक्त आना
  • अधिक मात्रा में रक्तस्राव
  • तेज या लगातार बुखार
  • बहुत तेज पेट दर्द
  • चक्कर आना
  • अत्यधिक कमजोरी
  • बेहोशी जैसा अनुभव
  • पेशाब बहुत कम होना
  • मुंह का बहुत सूखना
  • बच्चे, वृद्ध या अत्यंत दुर्बल व्यक्ति में रक्तयुक्त दस्त
  • लक्षणों का लगातार बढ़ना

ऐसी स्थिति में पहले रोग का कारण और गंभीरता निर्धारित करना आवश्यक है।

रक्तातिसार को केवल रक्त रोकने की समस्या क्यों नहीं मानना चाहिए?

आयुर्वेद की खूबसूरती यही है कि वह केवल दिखाई देने वाले लक्षण पर नहीं रुकता।

रक्त दिखाई दे रहा है, इसलिए केवल रक्त रोकना ही उद्देश्य नहीं है। यह देखना भी आवश्यक है कि पित्त क्यों बढ़ा, अग्नि की क्या स्थिति है, अतिसार किस प्रकार का है, रक्त क्यों दूषित हुआ और रोगी की शक्ति कितनी है।

अर्थात चिकित्सा का लक्ष्य केवल लक्षण दबाना नहीं, बल्कि सम्प्राप्ति-विघटन की दिशा में आगे बढ़ना है।


निष्कर्ष

रक्तातिसार अतिसार की ऐसी महत्वपूर्ण अवस्था है जिसमें मल के साथ रक्त आता है। चरक संहिता में इसे पित्त की तीव्र विकृति और रक्तदूष्टि से संबंधित अवस्था के रूप में समझाया गया है। इसके साथ तृष्णा, शूल, दाह और गुदप्रदेश में पीड़ा या पाक जैसे लक्षण भी हो सकते हैं।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में उपचार रोगी की दोषावस्था, अग्नि, आम, रक्तस्राव, रोग की तीव्रता और बल के अनुसार निर्धारित किया जाता है। कुटज-प्रधान विभिन्न शास्त्रीय योगों का वर्णन ग्रंथों में मिलता है, लेकिन उनका चयन और प्रयोग योग्य चिकित्सक की देखरेख में ही होना चाहिए।

मल में रक्त आना एक महत्वपूर्ण चिकित्सकीय संकेत है। इसलिए इसे लंबे समय तक केवल घरेलू उपचार से दबाने के बजाय उचित परीक्षण और आवश्यकता के अनुसार आधुनिक तथा आयुर्वेदिक दोनों दृष्टियों से मूल्यांकन करना अधिक सुरक्षित और विवेकपूर्ण है।


Classical References

  • चरक संहिता — चिकित्सास्थान — अतिसार चिकित्सा — 19/69–70
  • चरक संहिता — चिकित्सास्थान — अर्श चिकित्सा — कुटजादि रसक्रिया का प्रसंग
  • सुश्रुत संहिता — उत्तरतंत्र — अतिसारप्रतिषेध अध्याय
  • अष्टांग हृदय — अतिसार चिकित्सा संबंधी प्रसंग
  • शार्ङ्गधर संहिता — मध्यमखण्ड — अतिसार संबंधी योग
  • भावप्रकाश निघण्टु — कुटज द्रव्य का वर्णन

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वैद्य निकुल पटेल (बी.ए.एम.एस.)

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महत्वपूर्ण सूचना: इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है, और यह किसी भी रोग के निदान या चिकित्सा उपचार का विकल्प नहीं है। कृपया कोई भी उपचार शुरू करने से पहले किसी विशेषज्ञ आयुर्वेदिक वैद्य की सलाह अवश्य लें।

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